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Digitalization ke daur me Digital Loktantra kyun nahi?

डिजिटलाईजेशन के दौर में “डिजिटल लोकतंत्र” क्यों नहीं?

भारत दुनिया का सातवा (क्षेत्रफल में) और दूसरा (जनसंख्या में) सबसे बड़ा देश है। भारत दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओ में से एक है, फिर भी ये एक युवा राष्ट्र है। अठारहवीं सदी के मध्य में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अपने उपनिवेश की स्थापना तक इसके बहुत से इतिहास मुग़ल और राजपूत के अधीन में रहे हैं। 1947 की आजादी के बाद मतदाताओं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को इसके राष्ट्रवादी के आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व के तहत बनाया गया था।
संसद का चुनाव हर 5 साल में एक बार आयोजित किया जाता है। वर्तमान में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया है।
लोकतंत्र सरकार की एक प्रणाली है जो नागरिको को वोट देने और अपनी पसंद की सरकार का चुनाव करने की अनुमति देती है।
आजकल राजनीतिक पार्टियों का चुनाव के बाद वोटिंग मशीन पर सवाल उठाना मानो बहुत ही आसान हो गया है। और फिर हो भी क्यों न भारत एक ऐसा देश है। जिसमे देश की प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार है। 
परन्तु यदि हम डिजिटल भारत को सफलतापूर्वक आगे लेकर जाना चाहते हैं। तो हमे प्रत्येक स्तर पर डिजिटल भारत योजना को प्रोत्साहन देना होगा।
यदि हम भारतीय चुनाव की बात करें तो हम सब जानते हैं। कि चुनाव के समय ई. वी. एम. मशीन पर सवाल उठाना बहुत ही आम बात है। परन्तु सवाल उठाने बाले के लिए यह कहना आसान होता है। कि ई. वी. एम. मशीन में गड़बड़ी हुई है। परन्तु इस सवाल का सीधा मतलब होता है। प्रत्येक भारतीय नागरिक के चुनाव में दिए हुए वोट पर सवाल उठाना तथा नागरिकों के वोट के अधिकार का उलंघन करना।
 
एक रास्ता है। जिसके द्वारा भारत सरकार प्रत्येक वोट की व मानव अधिकारों की रक्षा कर सकती है। और भारत में होने वाले चुनाव में परदर्शता की क्रांति ला सकती है। जिसे हम डिजिटल लोकतंत्र भी कह सकते हैं। जिसे एक डिजिटल पहचान पत्र या डिजिटल आइडेंटिटी कार्ड का रूप दे सकते है। तथा इसी के साथ अगर ई. वी. एम. मशीन में फिंगरप्रिंट जैसे फीचर अपग्रेड कर दिए जाएं। 
 
जैसे: 
1. ई.वी.एम. मशीन में फिंगरप्रिंट भी अनिवार्य किया जाए।
2. चुनाव के दौरान डाले हुए वोटों का डिजिटल रूप से वेबपोर्टल पर गोपनीय विवरण।
 
 ...तो इसके परिणाम बहुत ही पारदर्शी हो सकते हैं।
 
ई.वी.एम. मशीन में इस तरह के फीचर बढ़ाये जाने का मतलब है। नागरिकों द्वारा डाले गए प्रत्येक वोट का विवरण एक वेबपोर्टल पर गोपनीयता के साथ संभलकर रखा जा सकता है। 
यदि कोई नागरिक अपने द्वारा दिये गए वोट की पूर्ण जानकारी भारत सरकार से चाहता है। तो वह उसे RTI के द्वारा पता कर सके। तथा इसके साथ ही सवाल उठाने वालों को भी पूर्ण सत्यता के साथ जवाब दिया जा सके।
 

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देश बदल रहा है। मानवता भी?

देश बदल रहा है। मानवता भी?


हम सभी को बचपन से पढ़ाया व सिखाया गया है। कि परिवर्तन प्रकृति का एक नियम है। जो कि हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखता है। फिर चाहे वो परिवर्तन हमारे व्यक्तिगत जीवन का हो या फिर हमारे समाज से संबंधित हो। सबका अपना एक महत्व है। जो कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमे प्रभावित जरूर करता है। साथ ही हमारे जीवन मे भी प्रभाव डालता है।
यदि इतिहास से वर्तमान तक देखा जाए तो समाज में व हमारे व्यक्तिगत जीवन में बहुत सारे बदलाव आए है। जिसमे से कुछ हमारे लिए अच्छे हैं तो कुछ चुनोतियाँ बनकर हमारे सामने भी खड़े हैं। और हमसे जबाब मांग रहे है। क्यों कि कहीं न कहीं हम ही उन बदलाब के लिये जिम्मेदार हैं। 
यदि वर्तमान में हमारे भारत देश की बात करें तो बहुत कुछ बदल रहा है। और बहुत कुछ बदल जा चुका है। जिसके परिणाम भलीभाँति, हम अपने आसपास और समाज में देख रहे हैं। ऐसे ही कुछ बदलाव देखकर खुशी होती है। तो वहीं कुछ दुःखद भी हैं। जो कि चुनौती बनकर हमारे सामने खड़े हैं। और जबाब मांग रहे हैं। जिनमे जातिवाद, धर्म, मानवता, मानसिकता इत्यादि शामिल हैं।
आइये ऐसे ही कुछ उदाहरणो से मिलते हैं। और गलतियां …

Wo pagli si diwani si...

वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है...
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है, 
आहट उसकी, जैसे दिल में हलचल सी कर जाती है, 
झुकी नजर उसकी, जैसे मुझको पागल कर जाती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।

आइना है उसकी नज़रें, जो सबकुछ बतलाती है, 
वो है पागल, जो दिल को झुटा बतलाती है, 
लगती है प्यारी, जब खुद ही वो शर्माती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।

कहता है जमाना कि, वो तो पागल है, 
वे-वजह, जब-जब वो मुस्कुराती है, 
जमाने को क्या पता, कि वो मुझसे क्यों शर्माती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।

जब आँखें मेरी मदहोश चेहरे से उसके, मिलकर आती हैं, 
काश वो समझ पाती कि, कितना मुझको वो तड़पाती हैं, 
खो गया गया हूँ मुझसे मै, न नींद मुझको अब आती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।....


                                                                 - अतुल कुमार                                             


Mein-Wo aur Metro

मैं-वो और मेट्रो...

मैं-वो और मेट्रो...
नबंवर महीने की जयपुर की वो गुनगुनाती और गुलाबी सी सुबह थी। और सुबह के लगभग 8 बज चुके थे। और अलार्म बार बार चीखकर अपना वक़्त बता रहा था। एक लड़का तकरीवन 24 -25 साल का, चेहरे पर एक अलग सी कशिश और ख़ामोशी लिए और वो लड़का जल्दी जल्दी अपने कॉलेज जाने के लिए तैयार होता है। और घर के नजदीक मेट्रो स्टेशन से, सुबह के 8:40 की मेट्रो पकड़ता है। काफी भीड़ और रोजमर्रा की तरह मेट्रो में, ऑफिस और कॉलेज जाने वालों की भीड़ में उसे भी जगह मिल जाती है। लड़के के बैग में हमेशा एक स्पाइरल डायरी हुआ करती थी। और इसी प्रकार एक छोटा सा सफर शुरू हो जाता है।, ...रोजाना की तरह रागिनी भी उसी रास्ते से मेट्रो पकड़ती है। जिसके चंचलपन, कॉलेज गोइंग गर्ल कि बजह से कॉलेज और घर में लोगों से घिरी रहती थी। उसकी आँखों में एक अजीब समुन्दर सी गहराई, शायद उसके शब्द बोल ही नहीं पाते होंगे। आँखें ही दिल की जुवां होंगी। ...हमेशा की तरह मेट्रो के अंदर जाने के बाद सीट के लिए जदो-जहद। और लड़के का सामना इत्तेफाकन रोज रागिनी से हुआ करता था। शायद ऊपर वाले को यही मजूर था। वो लड़का रागिनी की आँखों में देखता, और अप…