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देश बदल रहा है। मानवता भी?


Sources: Internet

देश बदल रहा है। मानवता भी?


हम सभी को बचपन से पढ़ाया व सिखाया गया है। कि परिवर्तन प्रकृति का एक नियम है। जो कि हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखता है। फिर चाहे वो परिवर्तन हमारे व्यक्तिगत जीवन का हो या फिर हमारे समाज से संबंधित हो। सबका अपना एक महत्व है। जो कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमे प्रभावित जरूर करता है। साथ ही हमारे जीवन मे भी प्रभाव डालता है।

यदि इतिहास से वर्तमान तक देखा जाए तो समाज में व हमारे व्यक्तिगत जीवन में बहुत सारे बदलाव आए है। जिसमे से कुछ हमारे लिए अच्छे हैं तो कुछ चुनोतियाँ बनकर हमारे सामने भी खड़े हैं। और हमसे जबाब मांग रहे है। क्यों कि कहीं न कहीं हम ही उन बदलाब के लिये जिम्मेदार हैं। 

यदि वर्तमान में हमारे भारत देश की बात करें तो बहुत कुछ बदल रहा है। और बहुत कुछ बदल जा चुका है। जिसके परिणाम भलीभाँति, हम अपने आसपास और समाज में देख रहे हैं। ऐसे ही कुछ बदलाव देखकर खुशी होती है। तो वहीं कुछ दुःखद भी हैं। जो कि चुनौती बनकर हमारे सामने खड़े हैं। और जबाब मांग रहे हैं।
जिनमे जातिवाद, धर्म, मानवता, मानसिकता इत्यादि शामिल हैं।

आइये ऐसे ही कुछ उदाहरणो से मिलते हैं। और गलतियां ढूंढते हैं।-

1. हमारे नए समाज में भगवान और अल्लाह को कुछ इस प्रकार बांट दिया गया है। जैसे वो ईश्वर नहीं, बल्कि दुश्मनों के नाम हों। जिसका परिणाम हम अपने दैनिक जीवन मे देख रहे हैं। जहां मानवता का सरे आम कत्ल किया जा रहा है।

2. नए समाज मे महिला जाति को सिर्फ एक वस्तु बनाने की तैयारियां कुछ यूं चल रहीं हैं। जैसे पुरुष जाति ने "महिला नामक" अपने लिए कोई खिलौना तैयार किया हो। जो सिर्फ पुरूष के अनुसार चलता है।

3. प्रकति में चल रहे बदलाव में सबसे ज्यादा छति अगर किसी को पहुंची है। तो शायद वो मानवता ही है। उसको कुछ इस प्रकार नष्ट किया जा रहा है। जैसे वर्षों से उसी ने हमको पीछे करके रखा था और आगे नही बढ़ने दिया। मगर सच्चाई क्या है वो तो हम सब जानते हैं।

4. अगर जातिवाद की बात की जाए तो "नया समाज" शब्द जोड़ना गलत होगा। क्यों कि ये तो वर्षों से चला आ रहा है। शायद यही वो विषय होना चाहिए था जिसे बदलाव की सबसे ज्यादा आवश्यकता थी और आज भी है। 

5. यदि "इंसानियत" की बात की जाए तो मृत्यु के मामले में वो भी अच्छी खासी रैंक पर होगी। उदहारण के तौर पर एक वाक्य पर चर्चा कर लेते हैं- एक व्यक्ति है जो अपनी व्यक्तिगत परेशानी से वे-हाल है जिसको मदद की जरूरत है। और मदद के बजाय उसका वीडियो बनाकर मनोरंजन के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। 

"ऐसे कई बदलाव है। जिन्हें सुनकर, पढ़कर, देखकर दुख होता है। जो समाज मे एक ऐसी सुरंग का निर्माण कर रहे हैं। जिसका द्वार हमारी आने बाली पीढ़ी के लिए सिर्फ एक हिंसा और बर्बादी के रूप में देखा जा सकता है।"

#AtulKumarColumns
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