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Mere Alfaaz

मेरे अल्फ़ाज़



लेखक हूँ।.. 
तन्हा से कागज पर, अधूरे अल्फाजों से कुछ "नये शहर" बनाता हूँ।
***




अब हँसी भी ढूंढती हैं। मुझको, गमों का बहाना लेकर 
मशहूर इतने हम, गमों के शहर में हो गये।
***





आज.. वो थोड़े मगरूर से दिख रहे थे। शायद, 
उनको हमारी ख्वाइशों की इल्तिजा हो चुकी है।

***




बस... आखिरी गुजारिस थी। खुद से, 
अब "नाम-ऐ-इश्क" फिर न लेंगे अपनी जुवां पर, वे-जुवान जज्बातों के लिए। जिसे वो "हसीन हुस्न" का करिश्मा समझ बैठे थे।
***




वर्षों बाद! खत आया था हु-ब-हु उनके नाम सा। 

कमवख्त.. वो भी ले गया कोई, माफी मांगकर।
***




यूँ तो। मै बुलाता नहीं अब, हसींन मुशायरे मे किसी को। 
बस.. कुछ अधूरे से अल्फाज हैं। तुम्हारे, जो मेरे हर मुशायरे को पूरा कर जाते हैं।
***




सुना है। अब, वो इश्क उन परिंदों से फरमाते हैं। 
जिनका जमीं पर आना-जाना कम होता है।
***




उम्रभर आगे चलना उसके।

ऐसा.. "जिंदगी" से, कोई मेरा सौदा कर गया।
***




सुना है। इश्क की दुकाने, अब मॉल बन गई हैं। 
जहाँ "इश्क" कम "दिखावा" बेहिसाब मिल रहा है।
***




आँसुओं से.. आज भी धो रहा हूँ। वो निशां उनके,

जो इश्क के शौक मे, मुझपे पड़ गये थे।
***





जो दिया करते थे। मात सबको, "इश्क" के गुरूर में, 
मैने उनको, कमवख्त उसी "इश्क" से मरते देखा है।
***




कभी अधूरापन महसूस हो तो वे-झिझक मांग लेना, 
मुझमें अभी भी मौजूद हो तुम।
***




आजकल... रिश्तों की माला खुद-व-खुद टूटने लगी है।
..लगता है। धागे को "जज्बातों" से बदला गया है।
***




आजकल... बाजार-ऐ-इश्क चल रहे हैं। सिर्फ मतलब से, 
"इश्क" सच समझकर, सब लुटा न देना।
***




क्या कीमत दी है? इस दिल को, 
जो.. ये मुझको-मुझसे मिलने नहीं देता।
***




ये शब्दों का मिज़ाज भी अजब सा हो गया है।... 
न लिखूं तो, शुकून ले जाते हैं। 
लिखता हूँ। तो खोई तस्वीर, बनकर सामने आ जाते हैं।
***




आज फिर आये थे। कुछ फरेबी, दर्द-ऐ-जख्म देने, 
हम भी मुश्कुराकर बोले.. 
दर्द-ऐ-लफ्ज देना, आजकल वही असर करता है।
***




पन्नों पर लिखे, इन लफ्जों को सिर्फ लफ्ज न समझ बैठना। 
ये, तो वक्त के वो हसीन लम्हे हैं। 
जिन्हे कभी... संभालकर रखा था। हसीन वक्त बनाने के लिऐ।
***




मै इश्क का, वो लम्हा हूँ। 
जिसने... उनको देखा कम, ...महसूस ज्यादा किया है।
***




वो शख्स रहनुमा सा था, और मैं राही सा। 
उसने रास्ते यूँ बदले कि, पैरौं के निशां का पता भी न चला।
***




अधूरे लफ़्ज़ों से बने शहर में, वो लफ़्ज़ों को समझने चले थे। 
हाथों में ना लफ्ज़ आये, ना ही शहर का नाम।
***




आजकल, ये कागज़ भी समझदार हो गए हैं। 
हम जब भी तुम्हे याद करके कलम उठाते हैं। 
कम्वख्त, खुद व खुद उड़कर सामने आ जाते हैं ।
***




यूँ तो जलते चरागों का कारोबार है। हमारा, 
कमवख्त ये चराग ही हैं। जो... तुम्हारी हट मे आज भी अंधेरा बिछाए बैठे हैं।
***




सुना है वो "अपनापन" तलाशने निकले हैं। 
बाजार में बैठे, उन दुकानदारों पर। 
जिन्होंने...खुद अपनों से वेवफाई कर, नई दुकान खोली है।
***




अब, खुद फूल भी मुरझाने लगे हैं। इस इश्क के लेन-देन में। 
न जाने, ये लोगों को एहसास कब होगा।
***




कमबख़्त ये नाम-ए-इश्क, दिन-व-दिन बढ़ता जा रहा है। 
शायद इसकी भी, अब उम्र हो चली।
***




सुना है। वो फिर से निकले हैं। "बाजार-ऐ-इश्क" की ओर, 
कुछ दुकानों से बेवफाई का बदला लेने।
***




जो लेते थे। कसमें भरे बाजार में हमसे, 
आजकल वो तनहाइयों में भी नजर-अंदाज किया करते हैं।
***




ख्वाब मुकम्मल से हो गए हैं। मात्र एक नजर से उनकी, 
इसे खता समझूँ अपनी, या जादुई नजर उनकी।
***




मुरीद-ऐ-इश्क हूँ। उस लम्हे का। 
कमबख्त, जो कभी अपना न हो सका।
***




मै इश्क का, वो राही हूँ। 
जिसकी राह गुमनाम और मंजिल सामने दिखती है।
***




वो वन्दिशें थी दिल की, या हसीं आँखें तेरी। 
जिन्होंने, खुद को कैदी कहकर, सारी दुनिया से मिला दिया।
***




इंसानी खेल देखिऐ। जनाब, 
यहाँ धड़कता दिल लेकर, जज्बातों से खेला करते हैं।
***



फूलों की "कलियाँ" भी छुप-छुप के खिलने लगीं हैं। 
शायद, इंसानियत पर "शक" उनको भी है।
***




फ़र्द:व्यक्ति 
जमाने का असर देखिए जनाब, जो "फ़र्द", राह बताते थे। सबको, 
आजकल, वो खाली बाजारों में खो जाते हैं।
***




तू राही-तू राह, तू ही है। रास्ता खुद पर विश्वास कर ले। 
तू सोच ले ये वक्त है। और वक्त पर विचार कर ले।
***




चली है हवा इश्क़ की, आंधी-तूफान वाकी हैं, 
छा गए हैं बादल दिलों पर, बरसात अभी वाकी है, 
मुश्कुरा लिया देखकर उनको युहीं, अभी उनका मुश्कुराना वाकी है, 
अभी तो मिली है बस..नज़र से नज़र, जान-पहचान अभी वाकी है।
***




बिछड़ने लगा है। साया बचपन का, अब मासूमों से, 
न जाने पढाई में "दिखावा" किसने मिला दिया।
***




वहम था। उनका कि, मैं सच नहीं लिखता। 
समझाता कैसे? 
मैं लिखता हूँ। "हाल-ऐ-दिल", इश्क नहीं लिखता।
***




ये लम्हा, जिसने एक मुशाफिर से मिलाया है। 
खुदा की इनायत है। जो उसे हू-ब-हू अपनों सा बनाया है। 
यूँ तो वक्त ने बहुत मोडो़ से मिलाया है।....पर, 
वो वक्त का ऐसा अल्फाज है।, जो मुझमे नया मोड़ लाया है।
***




इरादे... जिहादी और कत्ल-ऐ-इंसान, 
ये लफ्ज-ऐ-इंसानियत, जैसे तो नही दिखते। 
मासूमों से कह दो शतर्क रहें, आजकल 
समाज मे...कुछ हैवान, हैवानों जैसे नही दिखते।
***




रफ्तार-ऐ-जिन्दगी और लगाम भी उसकी। 
चलतीं कटपुतलियाँ जहाँ, वो राह भी उसकी। 
बने बैठे हैं। जो खुदा जमाने के, वो भी रहमत उसकी। 
ये शख्स है। वो... 
गीता, कुरान और बाइबल, सब कहानियाँ हैं। जिसकीं।
***




रूह शैतानों सी और लफ्ज इंसानों से, उनके हो गये हैं। 
शक्ल इंसानों सी और भूख मासूमों की है उनमे.. 
किस ओर जा रहा है। ये देश हमारा, समझना मुश्किल है। 
गलती हमारी या वेखौप इरादे व हौसले मुकम्मल, उनके हो गये हैं।
***

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Wo pagli si diwani si...

वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है...
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है, 
आहट उसकी, जैसे दिल में हलचल सी कर जाती है, 
झुकी नजर उसकी, जैसे मुझको पागल कर जाती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।

आइना है उसकी नज़रें, जो सबकुछ बतलाती है, 
वो है पागल, जो दिल को झुटा बतलाती है, 
लगती है प्यारी, जब खुद ही वो शर्माती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।

कहता है जमाना कि, वो तो पागल है, 
वे-वजह, जब-जब वो मुस्कुराती है, 
जमाने को क्या पता, कि वो मुझसे क्यों शर्माती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।

जब आँखें मेरी मदहोश चेहरे से उसके, मिलकर आती हैं, 
काश वो समझ पाती कि, कितना मुझको वो तड़पाती हैं, 
खो गया गया हूँ मुझसे मै, न नींद मुझको अब आती है, 
वो पगली सी दीवानी सी, सपनों में मेरे आती है।....


                                                                 - अतुल कुमार                                             


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